Red Fort : आखिर लाल किले के निर्माण के पीछे शाहजहाँ क्या कारण था ?

 
Red Fort : आखिर लाल किले के निर्माण के पीछे शाहजहाँ क्या कारण था ?

Red Fort :- इस बड़ी इमारत को किला-ए-मुबारक भी कहा जाता है। अर्थात् मूल नाम लाल किला नहीं है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने बताया कि इसके निर्माण के दौरान कई स्थानों पर चूना पत्थर का प्रयोग हुआ था। इसलिए, इसका रंग पहले लाल नहीं था बल्कि सफेद था। जब चूना पत्थर समय के साथ गिरने लगा, तो अंग्रेजों ने इसे लाल रंग कर दिया, जो बाद में लाल किला कहलाया। माना जाता है कि जन्नत का चित्रण करते हुए शाहजहां ने किले के अंदर कुछ हिस्से बनाए थे।

16 अप्रैल 1938 को लाल किले का उद्घाटन हुआ था। इस इमारत को करीब दस साल में बनाने में एक करोड़ रुपये खर्च हुए। आज इस कीमत पर एक साधारण फ्लैट ही मिलेगा। 2.4 किलोमीटर की चारदीवारी में बना हुआ यह किला है। 254.67 एकड़ की जमीन में किला है। लाहौरी और दिल्ली दरवाजे के नाम से भी जाना जाता है, किला दोनों पश्चिमी और मध्य दिशा में है।

लाहौरी गेट किले का मुख्य प्रवेशद्वार है। महलों तक पहुंचने के लिए दत् तादार रास्ता है। इसके अलावा, छत् ता चौक में मेहराबी कमरे बनाए गए हैं। संगमरमर की बड़ी छतरी के पीछे बादशाह शाहजहां का सिंहासन है। बदाशाह अपनी बैठक करने के लिए यहीं बैठते थे।

मुमताज महल लाल किले के दक्षिणी छोर पर है। संगमरमर से बना निचला भाग है। इसमें छह कमरे हैं और तहखाने पर एक बड़ा हॉल है। इसका नाम रंग महल पड़ा क्योंकि यह अंदर से दिखाई देता है।

किले पर भी एक शीश महल है। छह कमरों में स् तंभों वाली दो संगमरमर की कुर्सियां हैं। कक्षों की दीवारों पर शीशे के छोटे टुकड़े जड़े हैं। इसलिए इसका नाम शीश महल है।

यहां लोगों की जिंदगी बख्शी जाती है, ऐसा नहीं है। दरअसल, मोती मस्जिद के ऊपरी हिस्से में हयात बख्श बाम नामक एक बाग है। इन्होंने जिन् दगी बख् शाने वाला बाग भी कहा था।

इस बगीचे के उत्तरी और दक्षिणी भागों के बीच दो मंडप हैं। जिन्हें सावन भादो कहते हैं। ऊपरी मंडप में मोमबत्तियां रखने के लिए एक आला है। इस बगीचे में भी एक बड़ा सा तालाब है। लाल बलुआ पत्थर से बना एक बड़ा महल भी उसके बीच में खड़ा है। जफर महल इसका नाम है। बहादुर शाह द्वितीय ने इसे 1842 में बनाया था।

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